Tuesday, 3 January 2012


जीते हैं सभी फूलों से, यारी निभाकर देखिये !
देखना है तो काँटों को, दिल में बसाकर देखिये !!


चांदनी को तुम गले का, हार कहते हो सदा !
जिन्दगी को धूप का, आँगन बनाकर देखिये !!

रौशनी तुमको मिली है, हंस रहे हो क्यों मगर !
किसी अँधेरी झोंपड़ी में, दिन बिताकर देखिये !!


तापते हो हाथ अपने...जलाकर गरीबों के !
भूख को रोटी नहीं हो ..घर बनाकर देखिये  !!


खुशियों के बिस्तर बिछाके, नींद लेते हो मज़े में !
अश्कों की बरसात में , कुछ पल नहाकर देखिये !!


जो लगे हैं सारी दुनियां , खरीदने की होड़ में !
खुशियाँ रो देती हैं उनके, हाथों में आकर देखिये !!


आपको मालूम नहीं है, दिल किसे कहते हैं हम !
हम से कुछ मत पूछिए ..सोने को तपाकर देखिये !!


         राहुल गुप्ता, ग्वालियर  9826347016 

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